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इसराइल में उतार पर है नेतन्याहू का जादू?

सैबल दासगुप्ता की राय है कि हॉन्गकॉन्ग के लोग चीन के साथ आकर ख़ुश नहीं हैं लेकिन चीन दौलत के दम पर एक तबके की राय बदलने में कामयाब हो रहा है.
सैबल दासगुप्ता का आकलन है, "1997 में जब से हॉन्गकॉन्ग चीन के पास आया, तब से हॉन्गकॉन्ग के लोग नाराज़ हैं. आप कभी भी हॉन्गकॉन्ग जाइये, दुकानदार या फिर किसी और से बात कीजिए, उनको बस उनका लोकतंत्र और आज़ादी चले जाने का डर है. सारे आंदोलन यही बताते हैं. लेकिन उसके साथ हुआ ये है कि चीन के व्यापारी हॉन्गकॉन्ग में इतनी ज्यादा मात्रा में पैसे डालते हैं और चीन के पर्यटक इतनी बड़ी मात्रा में ख़रीदारी करते हैं कि हॉन्गकॉन्ग के व्यापारी चीन के समर्थक होने लगे. उन्हें लगा कि लोकतंत्र जाए भाड़ में यहां कमाई हो रही है. इतनी कमाई उन्होंने सपने में भी नहीं देखी."
लेकिन हॉन्गकॉन्ग में हर कोई स्वायत्तता की क़ीमत लगाने को तैयार नहीं. प्रत्यर्पण बिल के पहले भी हॉन्गकॉन्ग के लोग चीन की सख्ती पर ग़ुस्सा दिखा चुके हैं.
चीन के राष्ट्र गान के प्रति असम्मान ज़ाहिर करने पर दंडित करने का क़ानून, लोकतंत्र और आज़ादी समर्थक विधायकों की सदस्यता ख़ारिज करने और आज़ादी समर्थक कार्यकर्ताओं को जेल में डालने का विरोध होता रहा है और इस बार तो विरोध की सारी हदें ही टूट गईं.
अब चीन को महसूस हुआ कि टकराव का रास्ता उसका बड़ा नुक़सान कर सकता है.
सैबल दासगुप्ता कहते हैं, "हॉन्गकॉन्ग की एक और अहमियत है. चीन का जो पूरा वित्तीय बाज़ार है उसका बहुत बड़ा हिस्सा हॉन्गकॉन्ग में है. ये समझिए कि बड़ी-बड़ी चीनी कंपनियों का 40 से 50 प्रतिशत तक स्टॉक हॉन्गकॉन्ग में लिस्टेड हैं. शंघाई और शिनजेन में कम हैं. हॉन्गकॉन्ग में ज़्यादा है."
वो आगे कहते हैं, "लोकतंत्र की चाहत अगर आप दबा देते तो वित्तीय बाज़ार टूट जाएगा. चीन के बाज़ार पर ही इसका असर होगा. इसलिए चीन को लगा कि उन्होंने जल्दीबाज़ी की है."
अलका आचार्य चीन के मौजूदा रुख़ को अप्रत्याशित बताती हैं. वो कहती हैं कि चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग की छवि एक मज़बूत नेता की है. वो किसी मुद्दे पर झुकना पसंद नहीं करते. लेकिन इस बार चीन को पीछे हटने में दिक्क़त नहीं हुई.
अलका आचार्य कहती हैं, "सिंगापुर में जब शांगरीला डॉयलॉग हुआ था, तब वहां चीन के रक्षा मंत्री से इस बारे में पूछा गया था तो उन्होंने कहा था कि इसमें चीन का कोई हाथ नहीं है और बीजिंग की ओर से कोई निर्देश नहीं जा रहे हैं. इससे संकेत मिला कि चीन शायद इस मामले से थोड़ी दूरी बनाए रखेगा."
लेकिन क्या चीन ने अपनी हार मान ली है? संकेत कुछ और कहते हैं. हॉन्गकॉन्ग के प्रदर्शनकारी बिल के पूरी तरह ख़ात्मे और सीईओ के इस्तीफ़े की मांग कर रहे हैं.
चीन ने सीईओ कैरी लैम के प्रति समर्थन ज़ाहिर किया है. कैरी लैम ने माफ़ी तो मांग ली है लेकिन ये वादा नहीं किया है कि बिल दोबारा नहीं आएगा. अलका आचार्य की राय है कि चीन इस बिल को दोबारा पेश ज़रूर कराएगा.
सैबल दासगुप्ता भी ऐसा ही सोचते हैं. वो कहते हैं, "मुझे पूरा भरोसा है कि कम्युनिस्ट पार्टी नाक बचाएगी और इसे वापस लाएगी. उन्होंने थोड़ी जल्दीबाज़ी कर दी है लेकिन धीरे-धीरे आज़ादी की जो पुकार है उसे तोड़ने का मक़सद है. अगर ऐसा नहीं करेंगे तो चीन के अंदर आज़ादी की पुकार आ जाएगी. ताइवान, जापान, मलेशिया हर जगह परिवर्तन हो रहे हैं. वियतनाम में साम्यवाद ख़त्म हो रहा है. चीन सरकार को सब पता है. वो क़रीबी निगाह रखे हुए हैं. वन पार्टी सिस्टम ही उनकी ताक़त है. कुछ लड़कों को तोड़ दिया जाएगा. बाक़ी से मनवा लेंगे. एक कच्चा बिल आएगा. अपनी नाक बचाएंगे और फिर धीरे-धीरे उसमें संशोधन होता जाएगा. पता ही नहीं चलेगा कि अजगर कब सामने आ गया."
ये अजगर हॉन्गकॉन्ग की स्वायत्तता निगलना चाहेगा. रविवार को विरोध की आग से चीन की चिंता बढ़ाने वाला हॉन्गकॉन्ग क्या इस चुनौती को भी राख कर पाएगा. जवाब भविष्य की कोख में है.

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