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जब बंदर, सांप उड़ेंगे और इंसान भी बदल जाएगा

ये बात तो हम सभी जानते हैं कि इंसान के पुरखे बंदर थे. कभी हमारे पूर्वजों की पूंछ हुआ करती थी जो इंसान के क्रमागत विकास में धीरे-धीरे लुप्त होती चली गई.
जैसे-जैसे इंसानी शरीर का विकास होता गया, उसका रूप बदलता चला गया. शरीर के जिन अंगों की ज़रूरत नहीं थी, वो अपने आप ही ख़त्म होते चले गए. जैसे कि इंसान के शरीर में अपेंडिक्स का अब कोई रोल नहीं है. लिहाज़ा इसका आकार समय के साथ कम होता जा रहा है.
हो सकता है कुछ सदियों बाद ये पूरी तरह ख़त्म हो जाए. असल में प्रकृति के विकास का पहिया हमेशा घूमता रहता है. इंसान की पैदाइश इसी का नतीजा है.
सारे ही जीव प्राकृतिक विकास के नतीजे में पैदा हुए हैं. तो, अब ये मान लेना ग़लत होगा कि क्रमिक विकास का चक्र अब नहीं चल रहा है. इंसान भी इस प्रक्रिया से गुज़र रहा है. आगे चलकर इंसान के रंग-रूप में हमें और बदलाव देखने को मिल सकते हैं
नई रिसर्च तो यहाँ तक कहती हैं कि आने वाले समय में पूरी कायनात में ऐसे परिवर्तन होंगे कि धरती पर रहने वाला कोई भी जीव आज जैसा नज़र नहीं आएगा.
वर्ष 1980 में लेखक डुगल डिक्सन ने एक किताब लिखी थी, आफ़्टर मैन: ए ज़्यूलॉजी ऑफ़ द फ़्यूचर. इस किताब में उन्होंने लाखों साल बाद नज़र आने वाली ऐसी दुनिया की कल्पना की है, जिस पर यक़ीन कर पाना मुश्किल है.
इस किताब में उड़ने वाले बंदर, चिड़ियों की शक्ल वाले ऐसे फूल जिन पर शिकार ख़ुद आकर बैठता है और उड़ने वाले ऐसे सांपों का ज़िक्र है जो हवा में ही अपना शिकार कर लेते हैं.
किसी आम इंसान के लिए ये दुनिया किसी सनकी लेखक के दिमाग़ की उपज से ज़्यादा कुछ नहीं. ये पूरी तरह मनगढ़ंत है. लेकिन रिसर्चर इस किताब में भविष्य की तमाम संभावनाएं देखते हैं.
हम जानते हैं कि लाखों साल पहले धरती पर डायनासोर थे. लेकिन तब, अगर मौजूदा इंसान की कल्पना की गई होती तो ये उतना ही अजीब लगता, जितना आज हमें दस लाख साल बाद वाली दुनिया की कल्पना करके लगता है.
आख़िर क्रमिक विकास का गणित है क्या? इसे समझने के लिए इतिहास के पन्नों को पलटना होगा. विकास के जीव वैज्ञानिक जोनाथन लोसोस के मुताबिक़ 54 करोड़ साल पहले जब कैम्ब्रियन विस्फोट हुआ था, तो धरती कई तरह के अजीब जीवों से फट पड़ी थी.
वो लिखते हैं कि इस दौर के हैलोसेजिन्या नाम के एक जीव के जीवाश्म मिले हैं, जिसके पूरे शरीर पर हड्डियों का ऐसा जाल था जैसा कि हमारी रीढ़ की हड्डी में देखने को मिलता है. इस बात की पूरी संभावना है कि निकट भविष्य में ऐसे ही कुछ और जीव पैदा हो जाएं.
प्रोफ़ेसर लोसोस के मुताबिक़ बायोलॉजी के क्षेत्र में अथाह सभावनाएं हैं और इनका अंत कहां होगा कहना मुश्किल है. इनके मुताबिक अभी भी धरती पर ऐसी बहुत से जीव जिनके बारे में हमें पता तक नहीं हैं.
बायोलॉजिकल संभावनाओं पर लिखी अपनी किताब में लोसोस कई तरह के तर्क पेश करते हैं. इनके मुताबिक़ कहना मुश्किल है कि ये संभावनाएं कहां थमेंगी. अगर इतिहास ख़ुद को दोहराता है तो क्या इंसान का विकास क्रम वैसा ही होगा जैसा लाखों साल पहले था?
कहना मुश्किल है. लेकिन इस बात की संभावना ज़रूर है कि भविष्य में कोई बड़ा ज्वालामुखी विस्फ़ोट हो सकता है या धूमकेतु धरती से टकरा सकता है. इसके बाद धरती का पूरा रूप ही बदल जाएगा.
निकट भविष्य में क्या होगा ये बाद की बहस है. बड़ी बात ये है कि विकास क्रम का सबसे ज़्यादा असर अगर किसी पर देखने को मिल रहा है तो वो है होमो सैपियंस यानी इंसान पर.
जीवाश्म वैज्ञानिक पीटर वॉर्ड ने 2001 में अपनी किताब 'फ़्यूचर इवोल्यूशन' में लिखा था कि जिस तरह की ज़िंदगी आज का इंसान जी रहा है, अगर आने वाले कई लाख साल तक वो इसी तरह जीता रहा, तो हो सकता है धरती पर रहने वाले जीव उस वातावरण में ख़ुद को बनाए रखने के लिए अजीब रूप धारण कर लें.
मिसाल के लिए आज हम सभी प्रदूषित वातावरण में रह रहे हैं. अगर प्रदूषण इसी तरह बढ़ता रहा तो हो सकता है कि हमें ऐसी चोंच वाले परिंदे नज़र आने लगें जो टिन के कैन से पानी पीने में सक्षम होंगे. या ऐसे चूहे देखने को मिल जाएंगे जिनके शरीर पर चिकने बाल होंगे जो ज़हरीले पानी को उनके शरीर पर टिकने ही नहीं देंगे.
रिसर्चर पैट्रीशिया ब्रेनेन का कहना है कि धरती पर साफ़ पानी की कमी के कारण भी हो सकता है कि मौजूदा जीवों में ही ऐसे गुण पैदा हो जाएं जो बदले माहौल के मुताबिक़ ख़ुद को ढाल सकें. या ये भी हो सकता है कि ऐसे विशाल जीव पैदा हो जाएं जिनकी त्वचा में हवा से ही नमी लेकर पानी की कमी पूरी करने की क्षमता हो.
संभव है कि छिपकली के गले के पास झालरदार कॉलर और बड़ा हो जाए जहां वो ख़ुद के लिए पानी इकट्ठा करके रख सकें. संभावना तो इस बात की भी है कि कुछ जानवरों के शरीर से फ़र ख़त्म हो जाए और उनके शरीर पर पानी स्टोर करने के लिए बैग बन जाएं.
धरती के बढ़ते तापमान की वजह से गर्म इलाक़े में रहने वाले जीवों के लिए भी मुश्किल हो जाएगी. लिहाज़ा बदले माहौल में ख़ुद को ढालने के लिए उनकी शारीरिक बनावट में बदलाव होना लाज़मी है.
धरती पर जीव पैदा होने से लेकर आज तक बहुत सी प्रजातियां विलुप्त हुई हैं. इसके बाद ही बड़े पैमाने पर परिवर्तन भी हुआ है. रिसर्च बताती है कि अब से 25 करोड़ साल पहले क़रीब 95 फ़ीसद पानी में रहने वाले और 70 फ़ीसद ज़मीन पर रहने वाले जीव अचानक ख़त्म हो गए थे.
इसके बाद डायनासोर जैसे जीव का वजूद अमल में आया. लेकिन कुछ समय बाद इनका वजूद भी ख़त्म हो गया और स्तनधारी जीव पैदा हुए.
ऐसे ही बदलावों पर ग़ौर करने के बाद रिसर्चर कहते हैं कि धरती पर जीवन आने के शुरूआती एक लाख साल तक ऐसे जीव पैदा नहीं हो पाए, जिन्हें ज़्यादा ऑक्सीजन की ज़रूरत थी.
लेकिन दो लाख 40 हज़ार साल बाद जब फ़ोटोसिंथेसिस की प्रक्रिया होने लगी तो धरती से बहुत तरह के बैक्टीरिया समाप्त हो गए. जीवों की दुनिया में जब एक बार बदलाव हुए तो फिर होते ही चले गए. ये बदलाव हो रहे हैं और आगे भी होते रहेंगे.
हो सकता है निकट भविष्य में इंसान का वजूद पूरी तरह ख़त्म हो जाए और अजीब-ओ-ग़रीब जीव ही धरती पर राज करें. लेकिन ये निकट भविष्य में भी अभी इतनी दूर है कि आप, हम और हमारी आने वाली कई पीढ़ियां ये सब नहीं देख पाएंगी.

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